Saturday, 14 July 2012

भारत की विघटनकारी बाहरी शक्तियां. (ब्रेकिंग इंडिया - लेखक राजीव मल्होत्रा)

देश का आतंरिक मापदंड अवश्य यह होना चाहिए की हम अपने सबसे असमर्थ नागरिकों के लिए क्या कर रहे हैं, और इस विषय में अवश्य हमें कटु आलोचना करनी चाहिए. किन्तु साथ ही यदि हम एक राष्ट्र के रूप में बाहरी शक्तियों का सामना नहीं कर सके तो क्या परिणाम होंगे? - आक्रमण, उपनिवेशीकरण, और एक सांस्कृतिक-मानसिक साम्राज्यवाद.  ऐसा भारत के इतिहास में अनेक बार हुआ है. उदहारणस्वरुप,अंग्रेजों ने कई भारतीय राज्यों पर कब्ज़ा करने के लिए मानवाधिकारों का बहाना बनाया.  जबकि खुद अंग्रेजों ने वहीँ कितने अत्याचार किये, लेकिन उन्हें सही ठहराने के लिए और भारतीयों को क्रूर और बर्बर दिखलाने के लिए "बर्बरता के दस्तावेज" (Atrocity literature ) तैयार किये. उन्होंने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि उनकी क्रूरता भारतीयों को "सभ्य" बनाने के लिया गया जरूरी कदम था. 


- 1871 में एक अपराधी जनजाति कानून (क्रिमिनल ट्राइब एक्ट ) लागू किया गया, जिसके अनुसार कई भारतीय जातियों-जनजातियों को जन्म से अपराधी घोषित कर दिया गया और उन्हें जान से मारने को जायज ठहराया गया. जबकि ज्यादातर समूह सिर्फ अपने प्राकृतिक संसाधनों को अंग्रेजों द्वारा नष्ट किये जाने का विरोध कर रहे थे. "ठग" एक ऐसी ही जाति थी जिसे अंग्रेजों ने अपने दस्तावेजों में इतना बदनाम किया कि "ठग" अपराधी का पर्याय ही बन गया. 


- ऐसे ही तरीकों से अंग्रेजों ने संपत्ति पर औरतों के अधिकार को छीन लिया. "वीणा ओल्डेनबर्ग" ने अपनी पुस्तक "दहेज़ हत्या" में वर्णन किया है कैसे भारतीयों को उकसा कर उन्हें अत्याचार कि कहानियां बना कर पेश करने को कहा जाता था, जिसे फिर हमारी लोक-संस्कृति की खराबियां बताया जाता था. ऐसी मनगढ़ंत या बढ़ा-चढ़ा कर सुनाई गई  कहानियां फिर मनमाने कानून बनाने का बहाना बनती थी. मध्यम वर्ग में आज प्रचलित दहेज़ कि मांग की शुरुआत भी उसी समय हुई जब औरतों के संपत्ति पर अधिकार को अंग्रेजों ने कानून बना कर ख़त्म कर दिया.
- निकोलस डर्क उन विद्वानों में एक हैं जिन्होंने दिखाया है कि कैसे अंग्रेजों ने अत्याचार कि ऐसी ही कहानियों का उपयोग जातियों के बीच शत्रुता फैलाने के लिए किया, और फिर उसे "सुलझाने" के बहाने से हस्तक्षेप कर के भारत की सम्पदा को लूटा.
- मजदूरों पर अत्याचार के बहाने से कई भारतीय उद्योगों को प्रतिबंधित कर दिया गया. कपड़ा और स्टील उद्योगों को, जिसमें भारत इंग्लैंड से बहुत आगे था, ख़त्म कर दिया गया और भारत को सिर्फ एक बाजार बना दिया गया. अँगरेज़ लेखक विलियम डिग्बी के अनुसार 1757 से 1812 के बीच भारत से अंग्रेजों ने 1 अरब पौंड का मुनाफा कमाया( आज के मूल्य से 10  खरब). अँगरेज़ अपने प्रतिद्वंदी भारतीय उद्योगों पर मजदूरों से दुर्व्यवहार के आरोप दर्ज करते थे, फिर उनके धंधे बंद कर देते थे, हालांकि इससे मजदूरों कि हालत और खराब ही होती थी. 

सौ वर्ष पहले गांधीजी ने अपनी पुस्तक "हिंद स्वराज" में कहा था की कैसे जो भारतीय बिना सोचे समझे अंग्रेजों के लिए काम कर रहे हैं, वे अनजाने में अपनी गुलामी की जंजीरों को मजबूत कर रहे है. सौ साल बाद हमें आज फिर आत्म-मंथन करने की जरूरत है -
-क्या आज पश्चिमी तंत्र  भारतीय सिपाहियों का ही इस्तेमाल कर के भारत पर कब्ज़ा करने में पहले से भी ज्यादा सफल नहीं है? यह भारतीय बुद्धिजीवियों को अलग-अलग स्तर पर मिला कर किस तरह भारत के विरुद्ध अलगाववादी पहचान बनाने का काम कर रहा है?
-हमारी अनेक सामाजिक संस्थाओं और सरकारों का पश्चिमी चर्चों से क्या सम्बन्ध है?
- "मानवाधिकार" नाम के व्यवसाय को किस तरह से अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के विरुद्ध प्रयोग किया जा रहा है?
- बड़ी-बड़ी निजी संस्थाएं - फोर्ड फाउंडेशन, कार्नेगी फाउंडेशन, रॉकफेलर फाउंडेशन, लूस फाउंडेशन, प्यु ट्रस्ट क्या अमेरिकी शासन के हाथों कि कठपुतली हैं, और वे कैसे पूरी दुनिया पर शासन करने के अमेरिकी सपने को पूरा करने में जुटे हैं?   


हम इस पुस्तक में देखेंगे कि भारत की ये विघटनकारी शक्तियां किस तरह अंतरराष्ट्रीय ताकतों से संपर्क कर रही हैं, साथ ही आपस में भी सामंजस्य बना कर देश को तोड़ने के काम में लगी हैं. विशेषतः यह पुस्तक दिखाएगी की कैसे भारत में 200 वर्षों से मुख्यधारा से अलग "द्रविड़" और "दलित" पहचान की रचना करने का काम चल रहा है और इसके पीछे पश्चिमी तंत्र कैसे काम कर रहा है.  यहाँ प्रश्न उठता है की जब देश के अन्दर "अल्पसंख्यक" कहलाने वाले लोग एक अंतर्राष्ट्रीय बहुसंख्यक समुदाय का भाग बन कर काम कर रहे हों, तो "अल्पसंख्यक" की परिभाषा क्या होनी चाहिए?
Excerpted with permission from Malhotra, Rajiv and Aravindan Neelakandan, "Breaking India: Western Interventions in Dravidian and Dalit Faultlines," Amaryllis Publishers, Delhi, २०११


Chapter : Superpower or Balkanised War Zone?

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